आपका स्वागत है शब्द-शब्द अनमोल पर... हम लेकर आयें हैं आपके लिए अनमोल शब्दों की प्रासंगिकता सहित प्रस्तुति.....भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़े हिंदी के दुर्लभ-विस्मयकारी और महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या, शब्दों की उत्पति तथा उन शब्दों से जुडी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ....

Saturday, January 23, 2010

परिकल्पना पर "फगुनाहट सम्मान "

परिकल्पना पर जारी है " बसंतोत्सव " .... बहेगी बसंत की मादकता के साथ-साथ फगुनाहट की बयार होली तक लगातार ....  और थमेगी होली की मस्ती के साथ . इसके अंतर्गत हिंदी के कालजयी साहित्यकारों के साथ- साथ आज के कुछ महत्वपूर्ण कवियों की वसंत पर आधारित कवितायें प्रस्तुत की जा रही हैं. इसमें कवितायें भी है , व्यंग्य भी , ग़ज़ल भी , दोहे भी और वसंत की मादकता से सराबोर गीत भी . इस श्रृंखला में हम देंगे आपकी भी स्तरीय रचनाओं को सम्मान और प्रकाशित करेंगे परिकल्पना पर ...शर्त है कि आपकी रचना बड़ी न हो .

तो देर किस बात की आप अपनी वसंत की मादकता से परिपूर्ण एक छोटी रचना चाहे वह व्यंग्य हो , कविता हो , गीत हो अथवा ग़ज़ल..... यूनिकोड में टाईप कर भेज दीजिये निम्न लिखित ई-मेल आई डी पर -
mailto:ravindra.prabhat@gmail.com



हम आपकी रचनाओं को केवल प्रकाशित ही नहीं करेंगे बल्कि एक सर्वश्रेष्ठ रचना का चुनाव करते हुए उन्हें सम्मानजनक नगद राशि के साथ " फगुनाहट सम्मान " से नवाजेंगे भी .

Wednesday, January 13, 2010

भारत के सनातन दर्शन वेदांत के सबसे प्रभावशाली मतों में से एक है अद्वैतवाद

अद्वैत -


(संस्कृत शब्द, अर्थात अद्वैतवाद या एकत्ववाद या दो न होना), भारत के सनातन दर्शन वेदांत के सबसे प्रभावशाली मतों में से एक, इसके अनुयायी मानते है कि उपनिष्दों में इसके सिद्धांतों की पूरी अभिव्यक्ति है औ यह वेदांत सूत्रों के द्वारा व्यवस्थित है, जहां तक इसके उपलब्ध पाठ का प्रश्न है, इसका ऐतिहासिक आरंभ मांडूक उपनिषद पर छंद रूप में लिखित टीका मांडूक्य कारिका के लेखक गौड़पाद से जुड़ा हुआ है।

गौड़पाद सातवीं शताब्दी से पूर्व, शायद पहली पांच शताब्दियों के कालखंड में कभी हुये थे, कहा जाता है कि उन्होनें बौद्ध महायान के शून्यता दर्शन को अपना आधार बनाया था। उन्होनें तर्क दिया कि द्वैत है ही नही। मस्तिष्क, जागृत अवस्था या स्वप्न में माया में ही विचरण करता है और सिर्फ अद्वैत ही परम् सत्य है। माया की अज्ञानता.....

Monday, January 11, 2010

आत्मा रहित तत्त्व को अजीव कहा जाता है....निर्जीव नहीं

आप सजीव और निर्जीव के बारे में भलीभांति जानते होंगे , मगर क्या निर्जीव की  जगह आपने कभी अजीव का प्रयोग किया है ? आपका जवाब होगा नहीं .....! मगर यह जानकर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इसका प्रयोग हमारे भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्रता के साथ होता है .

दरअसल जैन धर्म में आत्मा रहित तत्त्व को अजीव कहा जाता है . अजीव को इस प्रकार विभक्त किया गया है -पहला आकाश अथवा अंतरिक्ष , दूसरा धर्म जो गति को संभव बनाता है , तीसरा अधर्म जो शेष क्रियाओं को संभव बनाता है , चौथा पुदगल यानी पदार्थ .....पुदगल में अणु होते हैं , यह अमर है लेकिन इसमें परिवर्तन और विकास हो सकता है . यह स्थूल और शूक्ष्म दोनों ही है अर्थात इसे देखा भी जा सकता है और इन्द्रियों से महसूस भी नहीं किया जा सकता . अदृश्य कर्म पदार्थ , जो आत्मा के साथ जुडा रहता है और इसे भार  प्रदान करता है , सूक्ष्म पुदगल का एक उदाहरण है . पहले तीन प्रकार के अजीव , आत्मा और पदार्थ के अस्तित्व के लिए आवश्यक शर्तें है . ऊपर वर्णित कुछ पारिभाषिक शब्दों का उपयोग बौद्ध दर्शन में भे हुआ है , लेकिन उनका अर्थ  भिन्न है .

Friday, August 21, 2009

ये अक्रियावाद क्या है ?

आज हम बात करने जा रहे हैं "अ " वर्णानुक्रम के अर्न्तगत आने वाले एक ऐसे शब्द के बारे में जो साधारणतया देखने और सुनने में सहज प्रतीत होता है मगर जब इस शब्द की गहराई में जायेंगे तो व्यापक अर्थ का बोध होगा , यह शब्द है -अक्रियावाद -
(संस्कृत शब्द, अर्थात् कर्मो के प्रभाव को नकारने वाला सिद्धांत), पालि में अकिरियावाद, भारत में बुद्ध के समकालीन कुछ अपधर्मी शिक्षकों की मान्यताएं, यह सिद्धांत एक प्रकार का स्वेच्छाचारवाद था, जो व्यक्ति के पहले के कर्मो का मनुष्य के वर्तमान और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव के पारंपरिक कार्मिक सिद्धांत को अस्वीकार करता है। यह सदाचार या दुराचार के माध्यम से किसी मनुष्य द्वारा अपनी नियति को प्रभावित करने की संभावना से भी इनकार करता है। इस प्रकार, अनैतिकता के कारण इस सिद्धांत के उपदेशकों की, बौद्धों सहित, इनके सभी धार्मिक विरोधियों ने आलोचना की, इनके विचारों की जानकारी बौद्ध और जैन साहित्य में अप्रशंसात्मक उल्लेखों के माध्यम से ही मिलती है। ज्ञात अपधर्मी उपदेशकों में से कुछ का विवरण इस प्रकार दिया जा सकता है। स्वेच्छाचारी सम्जय-बेलाथ्थि पुत्त, घोर स्वेच्छाचारीवादी पुराण कश्यप, दैववादी गोशला मस्करीपुत्र, भौतिकवादी अजित केशकंबली और परमाणुवादी पाकुड़ कात्यायन।

Friday, July 31, 2009

अज़ान का मतलब है उद्घोषणा

हमारा भारतीय समाज कई संस्कृति और कई भाषाओं का अनोखा गुलदस्ता है , गाहे- बगाहे हमें विभिन्न भाषाओँ के उन शब्दों को अंगीकार करने की आवश्यकता महसूस होती है जो हिन्दी में घुली-मिली है । इन्हीं भाषाओं में से एक है अरबी भाषा , जिसके बहुतेरे शब्द हिन्दी और उर्दू भाषा में काफी प्रमुखता के साथ प्रयुक्त होते रहे हैं । वर्णानुक्रम में यद्यपि हम अ श्रेणी के शब्दों की व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं .....इसीक्रम में एक शब्द आया है "अजान" जिसका प्रयोग उर्दू और हिन्दी में सामान रूप से आम-बोलचाल में होता है ......, आईये इस शब्द के बारे में विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं -
(अरबी में अधान: उद्घोषणा), शुक्रवार (जुमे) की सार्वजनिक नमाज़ और पांच दैनिक नमाज़ों के लिये मुस्लिम पुकार। इसकी घोषणा मुअज्जिन करता है, जो अपने अच्छे चरित्र के कारण मस्जिद का सेवक चुना जाता है, छोटी मस्जिदों में वह दरवाजे़ पर या बग़ल में खड़े होकर और बड़ी मस्जिदों में मीनार पर चढ़कर अज़ान देता है। मूलतः अज़ान प्रार्थना के लिये बुलावा था, लेकिन परंपरा के अनुसार, मुहम्मद साहब ने इस बुलावे को ज़्यादा सम्मानजनक बनाने की दृष्टि से अपने शिष्यों से विचार-विमर्श किया, अब्द अल्लाह बिन जायद को सपना आने पर कि निष्ठावानों को कोई आवाज़ लगाकर बुलाए, मामला तय हो गया। सुन्नी मत की मानक अज़ान का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है: ‘अल्लाह सबसे महान है। मैं मानता हूं कि अल्लाह के अलावा और कोई ईश्वर नहीं है।‘ मैं स्वीकार करता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के पैग़ंबर हैं। नमाज़के लिए आओ। मुक्ति के लिए आओ। अल्लाह सबसे महान है। अल्लाह के अलावा और कोई ईश्वर नहीं हैं।‘ पहले वाक्यांश की चार बार उद्घोषणा की जाती है और अंतिम वाक्यांश की एक बार तथा अन्य सभी वाक्यांशों की दो बार उद्घोषणा की जाती है, नमाज़ी प्रत्येक वाक्यांश का तयशुदा जवाब देते हैं। यही है अजान का अभिप्राय ...!

Wednesday, July 22, 2009

अग्नि : भारतीय परंपरा की महत्वपूर्ण अवधारणा

अग्नि हिन्दी में तत्सम के रूप में प्रयुक्त होने वाला शब्द है , जिसका अर्थ होता है आग । यह एक मूलभूत पदार्थ और भारतीय परम्परा की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है । ऋग्वेद का आरंभ एक श्लोक से होता है , जिसमें अग्नि का आह्वान किया गया है । अग्नि सभी प्रकार की उर्जाओं का प्रतिनिधित्व करती है। पौराणिक कथाओं में अग्नि का उसी प्रकार मानवीकरण किया गया है , जिस प्रकार अन्य मूलभूत तत्वों - जल , पृथ्वी, वायु और आकाश का किया गया है । वह सामान रूप से सूर्यग्नि, तदितऔर पूजन के लिए प्रज्जवलित हवं कुंड की अग्नि है । यज्ञ की अग्नि के दिव्य मानवीकृत रूप में अग्नि देवताओं के मुख , नैवेद के वाहक और मानव वो दैवी शक्तियों के बीच संदेशवाहक है ।
आरंभिक ग्रंथों में अग्नि की व्याख्या रक्ताभवर्नी और एक दयालु और एक कठोर मुख वाले द्विमुखी देवता के रूप में की गयी है । उनकी तीन या सात जिह्वाएं , लपटों की तरह खड़े बल , तीन पैर और सात भुजाएं हैं , मेष (मेढा) उनका वहां है । ऋग्वेद में कई बार उन्हें शिव के पूर्ववर्ती रूद्र के रूप में वर्णित किया गया है ।
नित्य अग्निहोत्र को शास्त्रों में देवयज्ञ कहा गया है । देवयज्ञ का अभिप्राय है- देवताओं को उद्देश्य करके किये जोन वाली क्रिया । एक यज्ञकुण्ड के अन्दर अग्नि को आधार करके और उस अग्नि को प्रदीप्त करने के पश्चात् औषधि आदि से सिद्ध किये हुए हव्य पदार्थों की आहुति नित्य दी जाती है । इस तरह करने से देवता प्रसन्न हो जाते हैं अर्थात् शुद्ध हो जाते हैं ।
'अग्नि वै देवानां मुखम्' अग्नि देवताओं का मुख है । इसलिये अग्नि के अन्दर जो भी कोई पदार्थ डाला जाता है वह सभी देवताओं को प्राप्त हो जाता है । जैसे अपने मुख के अन्दर डाली हुई चीज सारे शरीर के अन्दर पहुँच जाती है उसी तरह अग्नि के अन्दर डाली हुई वस्तु जल, वायु, अन्तरिक्ष आदि देवताओं को आसानी से प्राप्त हो जाती है । यही है अग्नि का यथार्थ ...!

Thursday, July 16, 2009

जहाँ समाप्ति की नियति है वहां हर कर्म क्षणिक और अपने लिए गढा गया हर अभिप्राय भ्रम होता है .

आज से हम शुरू कर रहे हैं अनमोल शब्दों की प्रासंगिकता सहित प्रस्तुति । हिंदू धर्म का अन्तिम संस्कार है अंत्येष्टि , जबकि हिन्दी शब्दकोष में यह पहले आता है इसलिए हम अंत्येष्टि से शब्दों की इस श्रंखला की शुरुआत कर रहे हैं । कहा भी गया है की जीवन की बात मृत्यु से शुरू की जानी चाहिए , जहाँ समाप्ति की नियति है वहाँ हर कर्म क्षणिक और अपने लिए गढा गया हर अभिप्राय भ्रम होता है ।
अंत्येष्टि- हिंदू धर्म में अन्तिम संस्कार, जिसमें जाति व् धार्मिक मत के अनुसार भिन्नता होते हुए भी सामान्यत:शवदाह के बाद अस्थि-भस्म को पवित्र नदी में प्रवाहित किया जाता है । अंत्येष्टि अनुष्ठान विभिन्न संस्कारों के क्रम में अन्तिम है । आदर्श रूप से संस्कार गर्भधारण के क्षण से हीं शुरू हो जाते हैं और व्यक्ति के जीवन में प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण पर संपन्न किए जाते हैं ।
मृत्यु के उपरांत शव को शमशान घाट ले जाया जाता है जो आमतौर पर नदी तट पर स्थित होता है । मृतक का सबसे बड़ा पुत्र और अनुष्ठानिक पुरोहित दह संस्कार करते हैं । इसके बाद ब्राहमणों में १० दिन तक ( क्षत्रियों में १२, वैश्यों में १५ और शूद्रों में ३० दिन ) परिवार के सदस्यों को अपवित्र समझा जाता है और उन पर कुछ वर्जनाएं लागू रहती है । इस अवधि में वे अनुष्ठान करते हैं , ताकि आत्मा अगले जीवन में प्रवेश कर ले । इन अनुष्ठानों में दूध और जल तथा अधपके चावल पिंडों का अर्पण शामिल है । निश्चित तिथि को शमशान से एकत्रित अस्थि अवशेष या तो दफन कर दिया जाता है या फ़िर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है । मृतकों के सम्मान में निश्चित तिथियों पर संवंधियों द्वारा श्राद्ध किए जाते हैं । यही है अंत्येष्टि का सच ...!