भारतीय संस्कृति में गर्भ धारण से लेकर मृत्यू प्रयन्त 16 संस्कारों की अवधारणा पायी जाती है। इन सभी संस्कारों का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक आधार भी है। प्राचीन काल में ज्ञान, संस्कृति, सभ्यता तथा सिद्धांतों को लिपिबद्ध नहीं किया जा सका अथवा वह कालान्तर में कहीं खो गया। हाँ भारतीय जनमानस ने श्रुति तथा वाचक परम्परा व पारम्परिक रूप से क्रियान्वयन के द्वारा सभी कुछ सुरक्षित एवं संरक्षित रखा है। हमारे अनेक विद्वानो द्वारा इस विषय पर शोध कार्य भी किये जा रहे हैं और यथा संभव लिपिबद्ध करने के प्रयास भी जारी हैं। 

 प्रत्येक संस्कार के लिए लोक-गीतों का है जिसके माध्यम से संस्कार के महत्त्व को दर्शाया जाता है। परन्तु यह भी विडम्बना ही है कि रोजी-रोटी की तलाश में घर गाँव दूर कार्यरत लोग अथवा भौतिक चकाचोंध में डूबे आधुनिकता पसंद लोग इन का महत्त्व तथा स्वरुप दोनों को ही नहीं जानते। कुछ तथाकथित नव धनाड्य, पच्छिमी सभ्यता का अंधानुकरण करने वाले तो हमारे भारतीय चिंतन एवं दर्शन को मजाक ही बताते हैं। भारतीय संस्कृति, चिंतन एवं दर्शन विश्व में सर्व श्रेष्ठ माना जाता है। हमारे सभी संस्कार वैज्ञानिक विवेचनायुक्त हैं। हाँ यह अवश्य है कि हमने अपने विचार, चिंतन, संस्कृति एवं प्रकृति को बचाये रखने के लिए अपनी ही अवधारणाओं विकसित किया। 

हमारे ऋषि-मुनियों ने पीपल वृक्ष के महत्त्व कप जाना तो उसके संरक्षण के लिए उस पर देवताओं के वास होने की बात जनमानस को समझायी। पीपल के आस-पास सफाई तथा उसकी सुरक्षा का महत्त्व समझाया। इसी प्रकार हमारे 16 संस्कारों का भी कोई न कोई वैज्ञानिक आधार है। हमारा प्रयास है कि देश के कोने-कोने से विभिन्न भाषाओं व बोलियों में बिखरे पड़े संस्कारों के महत्त्व, संस्कार विधि तथा लोक गीतों को संग्रहित कर शोध-ग्रन्थ के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत कर सकें। आपसे अनुरोध है कि आप किसी भी संस्कार से सम्बंधित लोकगीत, संस्कार विधि, संस्कार महत्त्व, कारण या अवसर का विवरण, सम्बंधित फोटो तथा पूर्व प्रकाशित पुस्तक आदि जो भी संभव हो भिजवाने कि कृपा करें। 

 जिन विद्वानों के आलेख अथवा कोई सामग्री हमें प्राप्त होगी उन सभी को प्रकाशन के उपरान्त एक -एक प्रति पंजीकृत डाक से प्रेषित की जायेगी। सामग्री के साथ अपना संक्षिप्त परिचय व फोटो भी प्रेषित करने की कृपा करें। अपना सामाजिक दायित्व समझते हुए हमने यह पुस्तक हिंदी भाषा में निकालने का निश्चय किया है। जिसके लिए किसी भी लेखक से सहयोग राशि नहीं ली जायेगी। पुस्तक में सभी तथ्यों को शोध करके लिखने का प्रयास किया जाएगा। भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं इसके वैज्ञानिक आधार को समझने के लिए यह बहुत महत्त्व पूर्ण ग्रन्थ साबित हो सकता है। कृपया अपना सहयोग यथाशीघ्र देने की कृपा करें।

 डॉ अ कीर्तिवर्धन
विद्या लक्ष्मी निकेतन 53-महालक्ष्मी एन्क्लेव जानसठ रोड , 
मुज़फ्फरनगर -251001 (उत्तर-प्रदेश) 08265821800 
a.kirtivardhan@gmail.com
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