दलित समाज की व्यथा दलित समाज की व्यथा

अभी हाल ही में मेरा एक  उपन्यास आया है  ताकि बचा रहे लोकतंत्र  जिसकी यत्र -तत्र-सर्वत्र  चर्चा हो रही है  इसी चर्चा के क्रम में  आज दैनिक जन...

Read more »
8:27 PM

सुबह-ए-बनारस सुबह-ए-बनारस

एक कविता करतालों की जगह बजने लगा है पाखण्ड अन्धविश्वास रुढियों को कंधे पे लटकाए सीढियां चढ़ रहा है चट्ट चट्ट लज्जित है सुबह क...

Read more »
1:28 AM
 
Top